क र कर सवाल खुद से वो रोज मरती रही, अपने दर्द को शब्दों के बर्तन भरती रही, कुछ लोग आए कहकर कलाकारी चले गए और वो बूंद बूंद बन बर्तन के इस पार झरती रही। खुशियाँ खड़ी थी दो कदम दूर, लेकिन दर्द के पर्दे ने आँखें खुलने न दी वो मंजिल के पास पहुंच हौंसला हरती रही। उसने दर्द को साथी बना लिया, सुखों को देख, कर दिए दरवाजे बंद फिर सिकवे दीवारों से करती रही। रोज चढ़ता सूर्य उसके आंगन, लेकिन अंधेरे से कर बैठी दोस्ती वो पगली रोशनी से डरती रही। इक दिन गली उसकी, आया खुशियों का बनजारा, बजाए इक तारा, गाए प्यारा प्यारा, बाहर जो ढूँढे तू पगली, वो भीतर तेरे, कृष्ण तेरा भीतर मीरा, बैठा लगाए डेरे, सुन गीत फकीर बनजारे का, ऐसी लगन लगी, रहने खुद में वो मगन लगी देखते देखते दिन बदले, रात भी सुबह हो चली, हर पल खुशनुमा हो गया, दर्द कहीं खुशियों की भीड़ में खो गया। कई दिनों बाद फिर लौटा बनजारा, लिए हाथ में इक तारा, सुन धुन तारे की, मस्त हुई, उसके बाद न खुशी की सुबह कभी अस्त हुई। आ भार
सुन्दर!!
जवाब देंहटाएंजैक एंड जिलवा वैंट अप द हिलवा, पनिया भरन के वास्ते वाले स्टाइल में...
जवाब देंहटाएंमेरा पतंगवा, गया हाई राइस असमनवा,
दूसरों की पतंगिया कटिंग के वास्ते...
जय हिंद...
मस्त लगे
जवाब देंहटाएंहवा में झूमे
देख किसी
परी को घूमे
( परी-स्त्री पतंग)
न घबराए,
जानबुझ जाए
पेचा लगाए
उसके संगवा
मेरा पतंगवा
वाह बेटा तुम्हारा पतंगवा तो कमाल का ऊड रहा है । सुन्दर रचना बधाईयाँ
बहुत खूब भाई , ये अन्दाज भी खूब भायी ।
जवाब देंहटाएंbahut sunder
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