संक्रांति है संस्कार-क्रांति

त्सव और त्योहार किसी भी देश और जाति के रहन-सहन, चरित्र, मूल्य, मान्यता, धर्म, दर्शन आदि का परिचय कराते हैं। कुछ त्योहार परमात्मा से, कुछ धर्मस्थापकों से, कुछ देवी-देवताओं से, कुछ विजय के अवसरों से और कुछ लोगों की मानवीय भावनाओं और कुछ प्रकृति के परोपकारों के प्रति कृतज्ञता भाव से जुड़े होते हैं। इन त्योहारों पर की जाने वाली सब प्रकार की पूजा, ध्यान, अनुष्ठान, पकवान, साज-सज्जा, सज-धज, राग-रंग के पीछे मूल उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मंगल मिलन कराना और आत्मा को ईश्‍वरीय विरासत से भरपूर करना ही होता है। त्योहार न हों तो जन-जीवन सूखा, बासी, रसहीन, सारहीन और उबाऊ हो जाए। लेकिन यह भी एक साथ तथ्य है कि विदेशी आक्रमणों, आपसी फूट, नैतिकता की उत्‍तरोत्‍तर गिरावट और धर्मग्रन्थों में क्षेपक और मिलावट हो जाने के कारण आज त्योहार विशुद्ध भौतिक आधार पर मनाए जाने लगे हैं। इसी कारण से समाज को वो लाभ नहीं दे पाते हैं जो कि ये दे सकते थे। अतः इनके विरुद्ध आध्यात्मिक अर्थ को समझकर उसमें टिकना हमारे लौकिक और पारलौकिक जीवन की उन्नति के लिए अति अनिवार्य, लाभकारी और मंगलकारी है। त्योहारों की कड़ी में, कड़ाके की सर्दी के बीच आता है मकर संक्रांन्ति का त्योहार जिसे सनातन धर्म के लोग बड़े उमंग के साथ मनाते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्योहार को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे पंजाब में इसे 'लोहड़ी' कहा जाता है तथा गुजरात में इसे 'उत्‍तरायण' कहा जाता है। यह देसी मास के हिसाब से पौष महीने के अंतिम दिन तथा अंग्रेजी महीने की 12,13,14 जनवरी को आता है। इस समय सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है अर्थात् उत्‍तरायण होता है इसलिए इसे संक्रमण काल भी कहा जाता है। संक्रमण काल अर्थात्‌ एक दशा से दूसरी दशा में जाने का समय। वास्तव में, यह एक दिन मनाया जाने वाला संक्रमण काल उस महान संक्रमण काल की यादगार है जो कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ में घटता है। इस संक्रमण काल (संगमयुग) पर ज्ञान-सूर्य भगवान भी अपनी राशि बदलते हैं। वे परमधाम को छोडक़र साकार वतन में अवतरित होत हैं एक साधारण वृद्ध ब्राह्माण के तन में अर्थात्‌ प्रजापिता ब्रह्मा के तन में और कलियुगी मनुष्यों को पुराने संस्कार छोडक़र नए सतयुगी संस्कार धारण करने की श्रीमत देते हैं। उसी ईश्‍वरीय कर्त्‍ताव्‍य को एक दिवसीय यादगार बनाकर संक्रांति के रूप में याद किया जाता है, मनाया जाता है। संसार में आज तक अनेकों क्रांतियां हुई हैं। कभी सशस्त्र क्रांति, कभी हरित क्रांति, कभी श्‍वेत क्रांति आदि-आदि। हर क्रांति के पीछे उद्देश्य होता है, परिवर्तन। सशस्त्र क्रांति में हथियारों के बल पर परिवर्तन लाने की कोशिश की गई, आंशिक परिवर्तन हुआ, पूर्ण नहीं। हरित क्रांति द्वारा भूमि की हरियाली अर्थात् हरे-भरे खेतों ने मानव जीवन को खुशहाल बनाने की कोशिश की। श्‍वेत क्रांति द्वारा दूध तथा डेयरी उत्पादन ने लोगों को समृद्ध करने की कोशिश की। इन सबसे लाभा हुआ परंतु संपूर्ण लाभ और संपूर्ण परिवर्तन को आज भी मानव तरस रहा है। वह बाट जोह रहा है ऐसी क्रांत‍ि की जिसके द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन हो जाए। कोई भी त्योहार परम्‍परागत नहीं है। भगवान कहते हैं सृष्टि के आदि काल अर्थात्‌ सतयुग तथा त्रेतायुग में दैवी मानव आज की तरह त्योहार नहीं मनाता था। वहां के देवी देवताओं के संस्कारों में, स्वभाव में हंसी, खुशी प्यार सम्‍मान, राग रंग इस प्रकार से रमे हुए थे कि वे 24 घंटे स्वाभाविक उमंग उल्लास और आनंद में रहते थे। ऐसा स्वभाव अथवा संस्कार उन्हें एक महान क्रञंति अर्थात्‌ संस्कार क्रञंति के फलस्वरूप मिला था। यह क्रांति आदि युग अर्थात् सतयुग से पहले के युग, संगमयुग में परमपिता परमात्मा शिव की अध्यक्षता में हुई थी। इस संस्कार क्रांति के फलस्वरूप, 100 फीसदी पवित्रता, दिव्यता, हर्षितमुखता, संतुष्टता, नम्रता, सत्यता के संस्कारों से विभूषित देवी देवताओं की हम आज भी मंदिरों में पूजा करते हैं और उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। इस क्रञंति के बाद सृष्टि पर 2500 वर्षों तक कोई क्रांत‍ि नहीं हुई। लेकिन 2500 वर्षों के बाद दैवी सृष्टि का परिवर्तन, मानवीय सृष्टि के रूप में हो गया। मानव स्वाभाव पर शनैः शनैः काम क्रोध की धूल जमने लगी। उसे उतारने के लिए समय समय पर त्योहार व उत्सव आयोजित किए जाने लगे। संक्रांति‍ का त्योहार भी संगमयुग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार में मनाया जाता है, लेकिन यादगार मनाने मात्र से मानव काम क्रोध के जमावड़ों की हटा न सका। हर वर्ष यह त्योहार मनाए जाने पर भी मानव हृदय की कल्मश में कोई कभी नहीं आई। इसीलिए कहा गया, दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। क्‍योंकि आज यह त्योहार विशुद्ध भौतिक रूप धारण कर गया है और इस दिन किए जाने वाले अनुष्ठानों के आध्यात्मिक अर्थ को भुला दिया गया है। इससें संबंधित हर क्रिया कलाप, आडम्‍बरों से, बाह्यमुखता से और सथूलता से भर गए हैं। इस दिन संसकार परिवर्तन, संस्कार परिशोधन, संस्कार दिव्यीकरण जैसा न तो कोई कार्यक्रम होता है, न लोगां को जागृति दी जाती है और न हीं संस्कारों की महानता की तरफ किसी को आकर्षित किया जाता है। अब परमात्मा पिता पुनः अवतरित होकर, कल्प पूर्व के ईश्‍वरीय कर्त्‍तव्यों की यादगार के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार के विभिन्न क्रिया कलापों का आध्यात्मिक अर्थ समझा रहे हैं।

स्नान : इस दिन लोग ब्रह्मामुहूर्त में उठकर अपने घर में स्नान करते हैं। कई लोग तीर्थों पर जाकर भी डुबकी लगाते हैं। यह जल स्नान वास्तव में ज्ञान स्नान की यादगार है। संक्रमण काल में ज्ञान सागर भगवान के दिए ज्ञान से अलसुबह ही स्वयं को भरपूर करने वाली आत्मा पुण्य की भागी अर्थात्‌ सतयुगी सृष्टि में उच्च पद की अधिकारी बनती है।

तिल खाना : इस दिन तिल भी खाते हैं और खिलाते भी हैं। तिल का दान भी करते हैं। जब किसी बहुत छोटी चीज के बारे में बताना हो तो उसकी तुलना तिल से करते हैं। सुक्ष्म चीज को स्पष्ट करने के लिए उसे तिल समान कहा जाता है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है अतः तिल समान कही जाती है और उसका आकार भी बिल्कुल गोल न होकर तिल की तरह ओवल अंडकार सा होता है। अतः तिल आत्मा का प्रतीक है और तिल खाना अर्थात्‌ तिल स्वरूप बनना अर्थात्‌ तिल सी सूक्ष्म आत्मा के स्वरूप में टिकना।

पतंग उड़ाना : जब आत्मा हल्की हो जाती है तो पतंग की तरह उडऩे लगती है। पतंग की तुलना आत्मा से की जाती है क्‍योंकि देहभान वाला उड़ नहीं सकता, वह जमीन पर रहता है, पर आत्मा के भान वाला पतंग की तरह, अपनी डोर भगवान को अर्पण कर तीनों लोकों की सैर कर सकता है। अत : आत्म उड़ान का प्रतीक है पतंग उड़ान।

तिल के लड्‌डू : तिल अकेले, खाओ तो थोड़ी कड़वाहट आती है, परंतु मिठास के साथ उन्हें संग्रहित कर लड्‌डू बना दिया जाए तो खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। इसी प्रकार अकेली आत्मा, अध्यात्म के मार्ग पर चले तो उसे अकेलापन, भारीपन आता है, परंतु जब आपसी प्यार रूपी मिठास से भरपूर संगठन मिल जाता है तो आगे बढ़ना सरल और सहज जाता है। अतः लड्डू एकता, मिठास तथा संगठन का प्रतीक है। एकता में ही बल है और सफलता है। मधुरता के साथ जब एक दूसरे के संबंध में आते हैं तो हम श्रेष्ठ बन जाते हैं।

तिल का दान : जैसे दीपदान होता है ऐसे ही तिलों का दान भी किया जाता है। दान से भाग्य बनता है, ग्रहण छूटता है, परंतु कई बार मनुष्य को दान देना भारी लगता है। धन का दान बड़ी बात नहीं है, परंतु बुराइयों का दान, काम क्रञेध का दान करना मुश्किल लगता है। इस मुश्किल को आसान करने का तरीका है कि जो भी कमजोरी है, उसे तिल समान समझकर दे दो, बड़ी बात नहीं समझो, छोडऩा पड़ेगा, देना पड़ेगा, ऐसे नहीं समझो, तिल के समान छोटी सी बात ही तो दान में देनी है, ऐसे समझो। खुशी खुशी छोटी सी बात समझकर दे दो। बड़ी बात को छोटा समझकर समाप्त करना ही तिल का दान करना है।

आग जलाना- इस दिन सामूहिक आग जलाई जाती है। इतिहास की दृष्टि से आग का बहुत महव है। प्राचीन काल में माचिस नही होती थी। घरों में आग का प्रयोग करने के पश्चात्‌ इस प्रकार दबा दिया जाता था कि वह जीवित रहे। सर्दियों में तो आग की आवश्यकता अधिक हो जाती थी। इसलिए गांव में संयुक्त रूप से ईधन इकट्ठा कर बड़ी आग जलाई जाती थी। इससे भ्रातृत्व भाव बना रहता था और उसी आग के चारों ओर बैठकर इक्‍ट्ठे खाने से स्नेह, सौहार्द भी निखर उठता था। आध्यात्मिक दृष्टि से आग या अग्रि शब्‍द का महव और भी अधिक है। अग्नि में डलने से कोई भी वस्तु पूरी तरह बदल जाती है। पुराने रूप का अंश भी नहीं बचता। सामूहिक आग वास्तव में सामूहिक योग-ज्वाला का प्रतीक है। जब योगीजन संगठित होकर एक ही संकल्प से ईश्‍वर की स्मृति में टिकते हैं तो उससे जो शक्ति आत्मा को मिलती है उससे पुराने संस्कार दग्ध हो जाते हैं, आत्मा आदि-अनादि रूप को पुनः प्राप्त कर लेती है। अतः अग्रि, परिवर्तन का प्रतीक है। पंजाब में इस त्योहार को 'लोहड़ी' नाम से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक देवी थी जिसका नाम लोहई था। इस देवी ने एक जालिम दैत्य को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को उस के प्रकोप से बचा लिया था, तभी से लोग इसे 'लोहड़ी' नाम से पुकारते हैं। लोहड़ी शब्‍द का संबंध 'लौ' अर्थात्‌ प्रकाश से अधिक लगता है। ज्ञान प्रकाश फैलने से अज्ञान अंधकार मिट जाता है। कलयुग रूपी रात में ज्ञान की लौ प्रज्वलित कर संसार में फैले अज्ञान अंधकार को समाप्त कर सद्भगुण और ज्ञान के प्रकाश से भरपूर कर देने का प्रतीक है लोहड़ी का त्योहार। आइये, हम सभी इसे खाने, खिलाने भर का त्योहार न मानें बल्कि इसमें समाए आध्यात्मिक रहस्यों को आत्मसात् कर जीवन को महान बनाने का दृढ़ संकल्प लें।

प्रस्तुति :- बीके शिखा

Comments

  1. अच्छी जानकारी है...आभार...
    आपको और आपके परिवार को मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !

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  2. मकर संक्रांति की शुभकामना!

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  3. Very informative post, full of information. Thanks .

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हार्दिक निवेदन। अगर आपको लगता है कि इस पोस्‍ट को किसी और के साथ सांझा किया जा सकता है, तो आप यह कदम अवश्‍य उठाएं। मैं आपका सदैव ऋणि रहूंगा। बहुत बहुत आभार।

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