द वरुण-घटिया सोच, जहरीली जुबां

'नफरती ठाकरे' के बाद घटिया सोच की उपज इसकी अगली कड़ी है 'द वरुण-घटिया सोच, जहरीली जुबां, इस फिल्म को बड़े पर्दे पर नहीं बल्कि छोटे पर्दे पर पेश किया जा रहा है। इसका नायक राज ठाकरे की वंश का नहीं, लेकिन उसकी सोच एवं उसके शब्द उसका कनेक्शन राज ठाकरे से जोड़ते हैं. इसका जन्म तो एक गांधी परिवार में हुआ, लेकिन गांधी होने के नाते महात्मा गांधी के बताए हुए रास्ते पर चलना इसको स्वीकार नहीं, जहां महात्मा कहते थे कि अगर कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरी गाल आगे कर दो, लेकिन ये न समझ मियां कहते हैं कि उस हाथ को काट दो॥वो किसी ओर पर भी उठने लायक न रहे. इस फिल्म के नायक का ये बयान सुनकर तो हर कोई दंग रह गया होगा, कहां मानव-जीव हित के लेख लिखने वाली मेनका गांधी और कहां ये जुबां से नफरत का जहर फेंकने वाला वरुण, वरुण के ऐसे 'फूट डालो, राज करो' वाले बयान सुनकर तो लगता है कि मेनका गांधी लिखने में इतना व्यस्त हो गई कि वो अपने बेटे को राजनीति के दांवपेच सिखाने एवं भारतीय संसकार देने ही भूल गई. आज से पहले तो हिंदुस्तान की सरकारी शिक्षा प्रणाली पर क्लर्क पैदा करने का आरोप लगता था, लेकिन विदेश पढ़ाई ने तो हिंदुस्तानी युवक को अंग्रेज बना दिया. उसकी रगों में खून तो हिंदी, लेकिन सोच इंग्लिशस्तानी है. अगर देश का युवा ऐसा होगा, तो देश कैसा होगा? एक सोचने वाली बात, एक दिमाग को झिंझोड़ देने वाला सवाल है. पहले नफरत का जहर प्यार की फिजा में राज ठाकरे ने घोला था, अब वो काम मनेका गांधी के पुत्र कर रहे हैं. वरुण को देखकर तो सोनिया गांधी को दाद देनी होगी कि विदेशी होने के बावजूद भी उसने अपने बच्चों को हिंदुस्तान में रहने की तमीज तो दी. परिवार एक है, लेकिन पार्टियां अलग अलग हैं. सोच अलग अलग है. एक तरफ राहुल गांधी जो अपने व्यक्तित्व के कारण आज लोकप्रिय है, कुछ लोग तो उसको प्रधान मंत्री बनाने के लिए भी हामी भर चुके हैं. और दूसरी तरफ खड़ा वरुण गांधी, जिसकी भाजपा में दो-कौड़ी की औकात नहीं. वरुण मियां बोले कि कोई है इस क्षेत्र में मेरे अलावा हिन्दुत्व को बचाने वाला. अरे न समझ, हिंदुत्व लोगों से नहीं, विचारधाराओं और सिद्धांतों जिंदा रहेगा. महान लोग जिंदा हैं, तो सिर्फ अपनी इच्छाईयों से, विचारों से, न कि शरीर से..

एक चुस्की...
अरे बेटा तुमने ये क्या कर दिया? मैंने तो तुम को अच्छे संवाद लिखकर दिए थे और तुमने ये क्या उलटा सीधा बोल दिया.
तुमको क्या बताऊं? मां, जनसभा में पहुंचकर याद आया कि तुम्हारा लिखा भाषण तो मैं घर भूल आया. बस जितना उसको पढ़ा था, मैंने बोल दिया, और तुम को तो पता ही है कि मेरी याददाश्त कमजोर है. शायद उलटा पुलट गया हूंगा.
अब क्या होगा? मां!
कुछ नहीं. तुम बोल दो कि मीडिया ने बयान तोड़ मरोड़ कर दिया है.
मां ये भी लिखकर दे दो न..
वरना कुछ और बोल दिया तो फिर कोई पंगा पड़ जाएगा।

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टिप्पणियाँ

  1. हिंदुत्व को इन जैसों की ज़रूरत न कभी रही है न कभी होगी

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  2. बेनामी3/22/2009 11:01 am

    चुस्‍की चुटीली है।

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  3. में आपके लेख से शत प्रतिशत सहमत नहीं हूं, अगर आजादी के इतने सालों बाद भी पाकिस्‍तान आतंकी वारदातों से देश को तहस नहस कर रहा है तो इसमें हमारे देश के राजनेताओं की नालायकी ही है, इसलिए चुपके से देश को बेच रहे गद़दारों के बजाय वरुण गांधी जैसे तेज तर्रार नेताओं की देश को आवश्‍यकता है, वैसे भी, किसी दलित परिवार के घर में रात गुजारने से देश का भला नहीं होता, उनके उत्‍थान की कोशिश की जानी चाहिए,

    समय आ गया है कि नेताओं को अपनी नीतियों को सार्वजनिक तौर पर जाहिर करना चाहिए, अगर वरुण गांधी ने अपने मन की भावनाओं को प्रकट किया है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है हालांकि सांप्रदायिक सौहार्द के लिए यह जरुर घातक है लेकिन अब महात्‍मा गांधी के एक गाल पर थप्‍पउ पडने पर दूसरा गाल आगे करने की थ्‍योरी पर अमल नहीं किया जा सकता, ईंट का जवाब पत्‍थर से देना होगा वरना मुंबई आतंकी घटना के समय हो हल्‍ला किसलिए,

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