और तो कुछ पता नहीं, लेकिन लोकतंत्र ख़तरे में है
जहां लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष रेल की पटरी सा होता है। तो वहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था एक रेल सी होती है। यदि दोनों पटरियों में असंतुलन आ जाए तो पटना इंदौर एक्सप्रेस सा हादसा होते देर नहीं लगती, सैंकड़ों जिंदगियां पल भर में खत्म हो जाती हैं। और पीछे छोड़ जाती हैं अफसोस कि काश! संकेतों पर गौर कर लिया होता। वक्त रहते कदम उठा लिये गए होते। ये संकेत नहीं तो क्या हैं कि देश सिर्फ एक व्यक्ति पर निर्भर होता जा रहा है। देश में विपक्ष की कोई अहमियत नहीं रह गई। सत्ता पक्ष के खिलाफ बोलना अब देशद्रोह माना जाने लगा है। किसी सरकारी नीति की आलोचना करने का साहस करने पर आपको बुरा भला कहा जाता है। दिलचस्थ तथ्य तो देखो कि भारत बंद की घोषणा होने के साथ ही सत्ता पक्ष की तरफ से कुछ दुकानों पर एक सरीखे नारे लिखे बोर्ड या बैनर टांग दिये जाते हैं। हर आदमी के गले में कड़वी बात को उतारने के लिए सेना और देशभक्ति का शहद की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि कड़वाहट महसूस न हो। पहले तो ऐसा नहीं होता था, सरकार के खिलाफ भारत बंद भी होते थे। जो लोग आज सत्ता में हैं, वो ही लोग लठ लेकर निकला करते थे...